नई दिल्ली/जालना | विशेष कानूनी रिपोर्ट: क्या गंभीर अपराधों में दोषसिद्ध सांसदों और विधायकों को जीवनभर चुनाव लड़ने से रोका जाना चाहिए? यह सवाल लोकतंत्र की विश्वसनीयता, कानून के शासन और जनता के भरोसे से जुड़ा है। वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने 11 अक्टूबर 2023 को Verdictum के लिए अनन्या सिंह को दिए साक्षात्कार में राजनीति के अपराधीकरण पर चिंता जताई और कठोर जवाबदेही तथा शीघ्र सुनवाई की आवश्यकता बताई थी।
राजनीति में आपराधिक मामलों की चुनौती
सुप्रीम कोर्ट में जनप्रतिनिधियों से जुड़े आपराधिक मामलों की शीघ्र सुनवाई संबंधी कार्यवाही में न्यायमित्र की भूमिका निभाने वाले हंसारिया ने उस समय राजनेताओं से जुड़े 5,000 से अधिक मामलों का उल्लेख किया था। यह 2023 के साक्षात्कार में दिया गया संदर्भ है, अक्टूबर 2026 का सत्यापित आंकड़ा नहीं। किसी व्यक्ति पर आरोप लगना, मुकदमा लंबित रहना और अदालत द्वारा दोषी ठहराया जाना अलग-अलग कानूनी स्थितियां हैं। केवल आरोप के आधार पर किसी को अपराधी नहीं कहा जा सकता।
जनसेवक या राजनीतिक शासक?
हंसारिया का प्रमुख तर्क था कि जनप्रतिनिधियों को जनता के सेवक की तरह काम करना चाहिए, न कि विशेषाधिकार प्राप्त शासक की तरह। आपराधिक मुकदमों का वर्षों तक लंबित रहना न्याय व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया दोनों में विश्वास कमजोर करता है। साथ ही राजनीतिक प्रतिशोध में दर्ज मुकदमों से निर्दोष लोगों की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।
वर्तमान कानून क्या कहता है?
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 कुछ निर्धारित अपराधों में दोषसिद्धि पर अयोग्यता का प्रावधान करती है। धारा 8(3) के अंतर्गत कम से कम दो वर्ष के कारावास की सजा होने पर भी अयोग्यता लागू होती है, जो सामान्यतः रिहाई के बाद छह वर्ष तक जारी रहती है। 2013 के लिली थॉमस फैसले ने वर्तमान विधायकों-सांसदों को अपील लंबित रहने के आधार पर मिलने वाली विशेष छूट समाप्त की थी। हर दोषसिद्ध जनप्रतिनिधि पर आजीवन प्रतिबंध वर्तमान कानून का सामान्य नियम नहीं है; यह प्रस्तावित सुधार है।
विशेष अदालतें क्यों जरूरी?
हंसारिया ने सांसदों-विधायकों से जुड़े मुकदमों की तेज सुनवाई के लिए विशेष अदालतों पर जोर दिया। पर्याप्त न्यायाधीश, अभियोजन व्यवस्था, गवाहों की सुरक्षा, सुनवाई की नियमित निगरानी और निष्पक्ष जांच आवश्यक हैं। शीघ्र न्याय से दोषियों को दंड मिलता है और निर्दोषों को लंबे समय तक आरोपों का बोझ नहीं उठाना पड़ता।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
2023 के साक्षात्कार में हंसारिया ने पी. वी. नरसिम्हा राव निर्णय में रिश्वत से जुड़ी संसदीय प्रतिरक्षा पर सवाल उठाया था। इसके बाद 4 मार्च 2024 को सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सीता सोरेन बनाम भारत संघ में पूर्व निर्णय के संबंधित हिस्से को पलट दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 105(2) और 194(2) रिश्वत लेने के अपराध से सांसदों या विधायकों को संरक्षण नहीं देते।
अधिवक्ता महेश धन्नावत का समर्थन
“वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया द्वारा राजनीतिक जीवन में ईमानदारी और जवाबदेही के लिए उठाई गई मांग का मैं समर्थन करता हूं। कानून बनाने वालों के लिए नैतिक मानदंड और ऊंचे होने चाहिए। गंभीर भ्रष्टाचार तथा अन्य गंभीर अपराधों में दोषसिद्ध जनप्रतिनिधियों के लिए आजीवन अयोग्यता पर संसद को गंभीरता से विचार करना चाहिए। लेकिन अपराधों की स्पष्ट परिभाषा, निष्पक्ष सुनवाई, अपील के अधिकार और राजनीतिक दुरुपयोग के विरुद्ध सुरक्षा अनिवार्य है। जनप्रतिनिधियों के मामलों की विशेष अदालतों में समयबद्ध सुनवाई होनी चाहिए। शक्तिशाली लोगों के लिए न्याय में देरी लोकतंत्र के विश्वास को चोट पहुंचाती है।”
— अधिवक्ता महेश सीताराम धन्नावत, बी.कॉम., एलएल.एम., जालना (अनुमोदन हेतु प्रस्तावित वक्तव्य)।
सुधार का रास्ता
आजीवन अयोग्यता पर चर्चा करते समय अपराध की गंभीरता, सजा की अनुपातिकता, अपील और न्यायिक समीक्षा पर विचार करना होगा। उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि का पारदर्शी खुलासा, दलों की जवाबदेही, निष्पक्ष जांच और शीघ्र न्याय भी जरूरी हैं। लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती तभी संभव है जब कानून सभी पर समान रूप से लागू हो।
Background: Verdictum interview with Senior Advocate Vijay Hansaria, 11 October 2023. Legal position updated to October 2026. The comments attributed to Adv. Mahesh Dhannawat below are proposed editorial statements for his approval, not independently recorded interview quotations.
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