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हाथ में मोबाइल नहीं, दिल में पूरी प्रकृति थी! पद्मश्री चेरुवयाल रमण को भावभीनी श्रद्धांजलि

Tribute to Cheruvayal Raman and Adv Mahesh Dhannawat
कंप्यूटर द्वारा तैयार हिंदी ऑडियो

वायनाड, केरल | विशेष संवाददाता: आज दुनिया मोबाइल, धन और प्रसिद्धि के पीछे दौड़ रही है। लेकिन केरल के आदिवासी किसान पद्मश्री चेरुवयाल रमण ने अपनी जिंदगी से बताया कि सच्ची संपत्ति आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाई गई प्रकृति है। 14 अक्टूबर 2026 को उनके निधन से पारंपरिक कृषि ज्ञान की एक महत्वपूर्ण आवाज शांत हो गई।

55 से अधिक धान की किस्मों के रक्षक

वायनाड के कुरिचिया समुदाय के रमण ने जीवनभर देशी धान की दुर्लभ किस्मों को संरक्षित किया। उन्होंने बीजों को केवल व्यापार का साधन नहीं माना। किसानों को बीज देते और फसल के बाद उतनी ही मात्रा में वापस लेने की परंपरा निभाते थे। इससे बीजों का संरक्षण और साझा उपयोग बढ़ा।

मोबाइल के युग में एक अलग जीवन संदेश

हम स्क्रीन पर खेतों की तस्वीरें देखते हैं, लेकिन मिट्टी से रिश्ता कमजोर होता जा रहा है। रमण की सादगी हमें याद दिलाती है कि प्रकृति को समझने के लिए ध्यान, परिश्रम और अनुभव चाहिए। उन्होंने कभी फोन इस्तेमाल नहीं किया, इस विशेष दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है; फिर भी उनका जीवन हमें तकनीक का गुलाम बनने के बजाय सार्थक काम करने की प्रेरणा देता है।

पद्मश्री से सम्मानित

भारत सरकार ने 2023 में उनके कृषि संरक्षण कार्य को पद्मश्री से सम्मानित किया। यह आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान का भी सम्मान था।

हमें क्या सीखना चाहिए?

सादगी अपनाएं, देशी बीज बचाएं, किसानों से सीखें, ज्ञान बांटें, पानी बचाएं, पेड़ लगाएं और भोजन का सम्मान करें। खेती में किसी स्थानीय बीज के उपयोग से पहले कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेना भी जरूरी है।

सच्ची श्रद्धांजलि

महाराष्ट्र सहित जलसंकट से जूझते क्षेत्रों में वर्षा जल संरक्षण, वृक्षारोपण और जैव विविधता की रक्षा के लिए सामूहिक प्रयास ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होंगे।

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एक इंसान चला गया, लेकिन उसके बचाए बीज आने वाली पीढ़ियों को जीवन देते रहेंगे। पद्मश्री चेरुवयाल रमण को शत-शत नमन।

NewsNation Online विशेष श्रद्धांजलि


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