“ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,
— अल्लामा मुहम्मद इक़बाल (बाल-ए-जिब्रील)
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है।”
English: “Raise your khudi (selfhood) so high that before every decree of destiny, Allah Himself asks His servant: ‘Tell me, what is your wish?’” – Allama Muhammad Iqbal
इस शेर का मतलब
अल्लामा इक़बाल का यह शेर उर्दू शायरी के सबसे मशहूर शेरों में से एक है। ‘ख़ुदी’ का मतलब घमंड नहीं, बल्कि अपनी पहचान, आत्मसम्मान और अपनी क़ाबिलियत पर भरोसा है। इक़बाल कहते हैं कि इंसान अपने किरदार, मेहनत और ईमान को इतना ऊँचा कर ले कि उसकी कोशिश ख़ुद उसकी क़िस्मत की दिशा बदलने लगे। यानी हाथ पर हाथ रखकर तक़दीर का इंतज़ार करने के बजाय अपने आप को इस लायक बनाओ कि कामयाबी तुम्हारे दरवाज़े पर आए।
ज़िंदगी से एक मिसाल
सोचिए, एक छोटे शहर का छात्र है जिसके घर में पढ़ाई का माहौल नहीं है। वह शिकायत करने के बजाय रोज़ सुबह एक घंटा पढ़ता है, कमज़ोर विषय के लिए शिक्षक से मदद माँगता है और मोबाइल पर वक़्त बर्बाद नहीं करता। कुछ महीनों में उसका आत्मविश्वास और नतीजे दोनों बदल जाते हैं। यही ख़ुदी है – हालात को बहाना नहीं, सीढ़ी बनाना। एक मज़दूर जो नया हुनर सीखता है, या एक माँ जो बच्चों को इज़्ज़त से जीना सिखाती है – सब इसी रास्ते पर हैं। मेहनत पर हमारा पिछला सुविचार भी पढ़ें: मेहनत ही असली प्रतिभा है।
आज क्या करें
- अपनी एक अच्छी आदत और एक कमज़ोरी काग़ज़ पर लिखें, और कमज़ोरी सुधारने के लिए आज एक छोटा क़दम उठाएँ।
- किसी काम को “मुझसे नहीं होगा” कहकर टालने के बजाय आज उस पर सिर्फ़ 20 मिनट लगाएँ।
- अपनी बात और वादे के पक्के रहें – आत्मसम्मान की शुरुआत यहीं से होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
“ख़ुदी को कर बुलंद इतना” शेर किसका है?
यह शेर ‘शायर-ए-मशरिक़’ अल्लामा मुहम्मद इक़बाल का है और उनके उर्दू काव्य संग्रह ‘बाल-ए-जिब्रील’ (1935) में शामिल है।
क्या ख़ुदी का मतलब घमंड है?
नहीं। इक़बाल के यहाँ ख़ुदी का मतलब आत्मसम्मान, ख़ुद्दारी और अपनी क़ाबिलियत को पहचानकर उसे अल्लाह की दी हुई नेमत समझते हुए आगे बढ़ाना है। घमंड इंसान को गिराता है, जबकि ख़ुदी उसे ऊँचा उठाती है।
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