नई दिल्ली: OBC क्रीमी लेयर के मानदंड को लेकर सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च 2026 के फैसले को लागू करने के तरीके पर केंद्र सरकार ने अदालत से दो साल का समय मांगा है। केंद्र का कहना है कि फैसले को पिछली तारीख से तुरंत लागू करने पर पहले से हो चुकी नियुक्तियों, वरिष्ठता, कैडर आवंटन, सेवा शर्तों और कुछ शैक्षणिक दाखिलों पर गंभीर प्रशासनिक असर पड़ सकता है।
24 सितंबर 2026 को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। अब अदालत यह तय करेगी कि 11 मार्च के फैसले को भविष्य की तारीख से लागू करने और उसे लागू करने के लिए केंद्र को दो साल का समय देने की मांग स्वीकार की जाए या नहीं।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का 11 मार्च का फैसला?
11 मार्च 2026 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने OBC क्रीमी लेयर की पहचान से जुड़े एक महत्वपूर्ण सवाल पर कहा था कि किसी अभ्यर्थी के माता-पिता की नौकरी से मिलने वाली वेतन या आय को अकेले निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता। खास तौर पर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) और निजी क्षेत्र में काम करने वाले माता-पिता के मामलों में केवल वेतन आय के आधार पर उनके बच्चों को OBC आरक्षण से बाहर करना पर्याप्त नहीं माना गया।
अदालत के अनुसार माता-पिता के पद और उसकी श्रेणी की स्थिति के साथ निर्धारित आय/संपत्ति संबंधी कसौटी को भी लागू करना होगा। यह व्यवस्था 1993 के संबंधित सरकारी कार्यालय ज्ञापन में निर्धारित क्रीमी लेयर मानदंडों के संदर्भ में देखी जानी है।
केंद्र ने दो साल का समय क्यों मांगा?
केंद्र की ओर से अदालत में कहा गया कि इतने बड़े बदलाव को तुरंत लागू करने से प्रशासनिक स्तर पर कई जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। सरकार के मुताबिक विभिन्न सरकारी विभागों, PSU और निजी क्षेत्र में पदों की समानता तय करने के लिए विस्तृत प्रक्रिया की जरूरत है। इसके लिए संबंधित पक्षों से सलाह लेकर एक समान नीति और तंत्र तैयार करना होगा।
केंद्र ने यह भी कहा कि यदि फैसले को पिछली तारीख से लागू किया गया तो पहले से चल रही या पूरी हो चुकी भर्ती प्रक्रियाओं की स्थिति पर सवाल खड़े हो सकते हैं। सरकार ने अदालत से फैसले को prospective effect यानी भविष्य में लागू करने की मांग की है, ताकि पुराने मामलों को नए मानदंड के आधार पर दोबारा खोलने से पैदा होने वाली जटिलताओं से बचा जा सके।
IAS-IPS और सिविल सेवा पर क्या असर पड़ सकता है?
केंद्र ने अपनी दलील में सिविल सेवा भर्ती का भी उल्लेख किया है। सरकार के अनुसार, अगर फैसले को पिछली तारीख से लागू किया गया तो 2012 के बाद की सिविल सेवा परीक्षाओं से नियुक्त उम्मीदवारों की स्थिति की समीक्षा का सवाल उठ सकता है। इससे सेवा आवंटन, कैडर आवंटन, वरिष्ठता और करियर प्रगति जैसे मुद्दे प्रभावित हो सकते हैं।
सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि इसका असर केवल OBC उम्मीदवारों तक सीमित नहीं रह सकता। यदि किसी अधिकारी की सेवा या कैडर स्थिति में बदलाव होता है, तो उसका असर अन्य श्रेणियों के अधिकारियों की वरिष्ठता और सेवा क्रम पर भी पड़ सकता है।
भर्ती और दाखिलों को लेकर भी चिंता
केंद्र का तर्क है कि नए मानदंड को पिछली तारीख से लागू करने पर उन उम्मीदवारों की स्थिति प्रभावित हो सकती है, जिन्होंने उस समय लागू नियमों और वैध प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी या दाखिला हासिल किया था। सरकार ने आशंका जताई है कि इससे OBC-NCL स्थिति, नियुक्ति, वरिष्ठता, सेवा शर्तों और पदोन्नति से जुड़े विवाद बढ़ सकते हैं।
इसके अलावा केंद्रीय और राज्य स्तर की भर्तियों तथा केंद्रीय और राज्य शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश पर भी इसका प्रभाव पड़ने की संभावना को केंद्र ने अदालत के सामने रखा है।
क्या केंद्र सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलना चाहता है?
केंद्र ने कहा है कि उसकी मांग 11 मार्च के फैसले की मूल कानूनी व्यवस्था को कमजोर करने या उसे पलटने की नहीं है। सरकार केवल उसके क्रियान्वयन को सीमित अवधि के लिए टालने और भविष्य से लागू करने की मांग कर रही है, ताकि प्रशासनिक व्यवस्था तैयार की जा सके और अलग-अलग क्षेत्रों में पदों की समकक्षता तय करने की प्रक्रिया पूरी हो सके।
सुप्रीम कोर्ट का अगला कदम क्या होगा?
24 सितंबर की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की याचिका पर आदेश सुरक्षित रख लिया है। इसलिए अभी यह तय नहीं हुआ है कि केंद्र को दो साल की अवधि मिलेगी या 11 मार्च का फैसला किस तारीख से और किस तरह लागू होगा। अदालत का अगला आदेश इस मामले में आगे की प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया की दिशा तय करेगा।
OBC उम्मीदवारों के लिए अभी क्या स्थिति है?
फिलहाल केंद्र की दो साल की मांग अपने आप में नियमों में बदलाव नहीं है। जब तक सुप्रीम कोर्ट इस आवेदन पर अंतिम आदेश नहीं देता, 11 मार्च 2026 के फैसले और उसके प्रभाव को लेकर अदालत के आदेश की स्थिति ही महत्वपूर्ण रहेगी। उम्मीदवारों को किसी भर्ती या प्रवेश प्रक्रिया में लागू आधिकारिक अधिसूचना और संबंधित विभाग के निर्देशों को ही आधार बनाना चाहिए।
स्रोत: Aaj Tak, Indian Express, PTI रिपोर्टों पर आधारित।

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