“करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
— कवि वृंद (वृंद सतसई)
रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान॥”
English: “Through constant practice, even a dull mind becomes wise — just as a rope, rubbing again and again, leaves a mark on stone.” (अनुवाद)
इस दोहे का अर्थ
कवि वृंद का यह दोहा पीढ़ियों से स्कूलों में पढ़ाया जाता है। इसका सीधा अर्थ है — लगातार अभ्यास करते रहने से कमज़ोर समझ वाला व्यक्ति भी समझदार और कुशल बन जाता है। जैसे कुएँ की मुलायम रस्सी बार-बार आने-जाने से कठोर पत्थर पर भी निशान बना देती है, वैसे ही रोज़ की छोटी-छोटी मेहनत बड़ी से बड़ी कठिनाई को आसान कर देती है। यहाँ असली ताकत रस्सी की नहीं, बल्कि निरंतरता की है।
एक सच्चा-सा उदाहरण
जालना की आठवीं कक्षा की एक छात्रा गणित से डरती थी। उसने तय किया कि रोज़ सिर्फ़ 20 मिनट पहाड़े और पाँच सवाल हल करेगी — चाहे मन हो या न हो। पहले महीने फ़र्क नहीं दिखा, लेकिन तीसरे महीने वही छात्रा कक्षा में सबसे पहले हाथ उठाने लगी। यही बात एक दर्ज़ी, एक मज़दूर या नई नौकरी सीख रहे युवा पर भी लागू होती है — हुनर एक दिन में नहीं, रोज़ के अभ्यास से आता है। मेहनत पर हमारा पिछला सुविचार भी पढ़ें: मेहनत ही असली प्रतिभा है।
आज क्या करें
- कोई एक कमज़ोर विषय या हुनर चुनें और आज उस पर सिर्फ़ 20 मिनट दें।
- एक छोटी डायरी में रोज़ का अभ्यास लिखें, ताकि प्रगति दिखाई दे।
- गलती होने पर रुकें नहीं — कल फिर उसी समय अभ्यास दोहराएँ।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1: “करत-करत अभ्यास के” दोहा किसने लिखा है?
उत्तर: यह दोहा रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि वृंद का है और उनकी रचना “वृंद सतसई” से लिया गया है।
प्रश्न 2: इस दोहे में “जड़मति” और “सुजान” का क्या अर्थ है?
उत्तर: “जड़मति” का अर्थ है कम समझ वाला व्यक्ति, और “सुजान” का अर्थ है समझदार या कुशल व्यक्ति।
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