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डीजे पर हाईकोर्ट के फैसले के बाद महेश धन्नावत की अपील, “अब आपसी विवाद छोड़कर साथ आने का समय”

Collage showing a man in a suit with glasses in front of the High Court of Karnataka, a large 'No DJ' symbol, and colorful protest visuals behind him.

जालना. त्योहारों और धार्मिक जुलूसों में डीजे और तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के बाद इस मुद्दे पर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है. वरिष्ठ अधिवक्ता महेश धन्नावत ने कहा है कि अब समय आ गया है कि दोनों समाज आपसी आरोप-प्रत्यारोप और “हम पर ही पाबंदी क्यों?” वाली सोच छोड़कर मिलकर आगे आएं.

कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश विभू बाखरू और न्यायमूर्ति सी. एम. जोशी की खंडपीठ ने डीजे और हाई पावर साउंड सिस्टम से जुड़े मामले में ऑल कर्नाटक लाइट म्यूजिक एंड कल्चरल आर्टिस्ट्स एसोसिएशन की याचिका खारिज कर दी.

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

मामले में ध्वनि प्रदूषण को लेकर लागू नियमों का भी जिक्र किया गया. ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 के अनुसार रिहायशी इलाकों में दिन के समय 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल तक की ध्वनि सीमा तय है.

हाई पावर डीजे और साउंड सिस्टम से इन तय सीमाओं का पालन मुश्किल होने की बात सामने आई. ऐसे में सार्वजनिक कार्यक्रमों और जुलूसों में पुलिस की ओर से लगाई गई पाबंदियों को अदालत ने कानून के दायरे में माना.

“कानून से बड़ा कोई नहीं”

हाईकोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए एडवोकेट महेश धन्नावत ने कहा कि एक हिंदू होने के नाते उनकी व्यक्तिगत राय थी कि जब तक पारंपरिक वाद्य बजाने वाले दल पर्याप्त रूप से तैयार नहीं हो जाते, तब तक डीजे को अनुमति मिलनी चाहिए.

लेकिन उन्होंने साफ कहा कि कानून से बड़ा कोई नहीं है. धन्नावत के मुताबिक, अब सबसे अच्छा रास्ता यही है कि कानून का सम्मान करते हुए त्योहारों को पारंपरिक वाद्यों की धुन पर पूरे उत्साह के साथ मनाया जाए.

“सिर्फ हमारे धर्म पर ही पाबंदी क्यों?” यह सोच बदलनी होगी

महेश धन्नावत ने कहा कि जब सरकार या कोई एक समाज दूसरे समाज से लाउडस्पीकर या डीजे हटाने की बात करता है, तो तुरंत सवाल उठता है कि “सिर्फ हमारे धर्म पर ही पाबंदी क्यों लगाई जा रही है?” उनके मुताबिक यही सोच धीरे-धीरे आपसी अविश्वास और धार्मिक तनाव को बढ़ाती है. अब इस सोच को खत्म करने का समय है.

उन्होंने कहा कि सभी समाजों को एक साथ बैठकर इस मुद्दे पर बात करनी चाहिए. ऐसी किसी भी गतिविधि से बचना चाहिए, जिससे बीमार लोगों, बुजुर्गों, छोटे बच्चों और आम नागरिकों को परेशानी होती हो.

गणेश मंडलों और मुस्लिम समाज से मिलकर पहल करने की अपील

धन्नावत ने कहा कि गणेश मंडलों को आगे आकर डीजे की जगह ढोल-ताशा और दूसरे पारंपरिक वाद्यों का इस्तेमाल करना चाहिए.

इसी तरह उन्होंने मुस्लिम समाज से भी मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकर को लेकर अपनी तरफ से पहल करने की अपील की. उनका कहना है कि अगर दोनों समाज अपनी-अपनी तरफ से कदम उठाएंगे, तो इससे समाज में एक अच्छा संदेश जाएगा.

उन्होंने कहा कि हिंदू और मुस्लिम समाज के धर्मगुरु, धार्मिक नेता और सामाजिक विचारक एक जगह बैठें और आपस में बातचीत करें. त्योहारों का मकसद खुशी, आस्था और भाईचारा है, इसलिए इसे विवाद का कारण नहीं बनने देना चाहिए.

“त्योहार खुशी और भाईचारे के साथ मनाएं”

महेश धन्नावत ने कहा कि आज जरूरत किसी एक समाज के खिलाफ खड़े होने की नहीं, बल्कि मिलकर रास्ता निकालने की है.

अगर दोनों समाज कानून का सम्मान करते हुए आगे आएं और पारंपरिक तरीके से त्योहार मनाएं, तो धार्मिक उत्साह भी बना रहेगा और आम लोगों को होने वाली परेशानी भी कम होगी.

उन्होंने कहा कि त्योहारों को आपसी भाईचारे, शांति और खुशी के माहौल में मनाना ही आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है.

स्रोत: कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले से संबंधित न्यायिक रिकॉर्ड और अधिवक्ता महेश धन्नावत का बयान.

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dhannawatmahesh

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