वैश्विक अशांति और भारत की स्थिरता
आज पूरा विश्व एक अभूतपूर्व और गंभीर संकट का सामना कर रहा है। रूस-यूक्रेन और मध्य पूर्व में जारी युद्ध की ज्वालाओं से उत्पन्न वैश्विक अशांति, कई विकसित देशों को अपनी चपेट में लेने वाली भीषण आर्थिक मंदी, खाद्यान्न की कमी और चरमराई वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला — इन सभी कारकों ने विश्व के अनेक देशों में आम जनता का जीवन अत्यंत कठिन बना दिया है। विश्व के मानचित्र पर जहां कई राष्ट्रों में दैनिक मूलभूत आवश्यकताओं और सुरक्षा के लिए हाहाकार मचा हुआ है, वहीं भारत द्वारा प्रदर्शित सामाजिक शांति, आर्थिक स्थिरता और आंतरिक एकजुटता निश्चित रूप से सराहनीय है। हालांकि, प्रकृति या परिस्थितियों द्वारा थोपी गई चुनौतियों की तुलना में जब कुछ स्वार्थी तत्व और गैर-जिम्मेदार नेतृत्व समाज में असंतोष का विष घोलते हैं, तब वास्तविक खतरे की घंटी बजती है।
वैश्विक वास्तविकता की भारत से तुलना
वैश्विक स्तर पर उत्पन्न गंभीर स्थिति से तुलना की जाए, तो भारत की वर्तमान वास्तविकता और स्थिरता और अधिक स्पष्ट रूप से सामने आती है। यूरोप और एशिया के कई देशों में आज महंगाई चरम पर पहुंच चुकी है और खाद्यान्न का भीषण संकट खड़ा हो गया है। इसके विपरीत, भारत के पास पर्याप्त अन्न भंडार उपलब्ध है और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से समाज के अंतिम व्यक्ति तक खाद्यान्न की सुचारू आपूर्ति बनाए रखने में सफलता मिली है। जहां विश्व की अग्रणी और महाशक्ति मानी जाने वाली अर्थव्यवस्थाएं मंदी के दौर से गुजर रही हैं और वहां रोजगार का गंभीर संकट खड़ा हो गया है, वहीं भारत आज विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती और स्थिर अर्थव्यवस्था के रूप में मजबूती से टिका हुआ है। युद्ध के बादल, राजनीतिक अस्थिरता और शरणार्थियों की गंभीर समस्याओं के कारण कई देशों में भड़की सामाजिक हिंसा को देखते हुए, भारत की अगाध विविधता के बावजूद यहां कायम आंतरिक शांति हमारी एक बहुत बड़ी ताकत है।
राजनीतिक स्वार्थ और भय का वातावरण
परंतु, यह शांति और सामाजिक सौहार्द कुछ स्वार्थी तत्वों की आंखों में खटक रहा है। प्रकृति कभी सूखा थोपती है, तो कभी अतिवृष्टि जैसे संकट खड़े कर देती है; ये मानव नियंत्रण से परे प्राकृतिक चुनौतियों के रूप हैं। मानव बुद्धि और सामूहिक शक्ति की वास्तविक परीक्षा ऐसे ही कठिन समय में होती है। दुर्भाग्य से, आज देश में कुछ राजनीतिक नेता और स्वार्थी तत्व केवल अपने अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए समाज को डराने का काम कर रहे हैं। संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर लगातार प्रश्न उठाना, मूलभूत आवश्यकताओं की कमी का झूठा भय लोगों के मन में पैदा करना और बिना किसी कारण समाज में असंतोष फैलाना — यही उनका एकसूत्रीय कार्यक्रम बन गया है।
शास्त्री जी का धैर्य और संयम का पाठ
ऐसे कठिन समय में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री, ‘भारत के सच्चे लाल’ स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री जी की विशेष रूप से याद आती है। १९६५ के दौर में भारत पर एक तरफ युद्ध का साया था, तो दूसरी तरफ भीषण सूखे का महासंकट खड़ा था। परंतु, ऐसी अत्यंत विकट परिस्थिति में भी शास्त्री जी ने हताश न होकर विलक्षण धैर्य और संयम का परिचय दिया। उन्होंने केवल शब्दों से ही नहीं, बल्कि अपने आचरण से देश को राह दिखाई। खाद्यान्न की तीव्र कमी के समय उन्होंने देशवासियों से सप्ताह में एक समय उपवास रखने का आह्वान किया, लेकिन उससे पहले अपने स्वयं के घर में इसकी शुरुआत की। शास्त्री जी के इस आह्वान का पूरे देश ने अत्यंत आदर और एकजुटता के साथ समर्थन किया। संकट चाहे कितना भी बड़ा हो, यदि नेतृत्व ईमानदार हो और जनता में आपसी समझदारी तथा धैर्य हो, तो राष्ट्र किसी भी तूफान से सफलतापूर्वक बाहर निकल सकता है — यही शास्त्री जी ने सिद्ध करके दिखाया। अपने विचारों और कार्यों से जनता को दिशा दिखाने वाले ऐसे ही जननायक समाज में अमर रहते हैं। आज के दौर में भी राजनीतिक असंतोष फैलाने वालों की तुलना में शास्त्री जी की धैर्य और संयम की इसी विरासत को संजोकर रखने की आवश्यकता है।
दुष्प्रचार और सामाजिक खतरे
इसी में और इजाफा करते हुए कुछ तथाकथित भविष्यवक्ता, विश्लेषक और विचारक अपने ज्ञान का दुरुपयोग करके जनता में निराशा बो रहे हैं। प्रकृति का संकट या सूखा वास्तविक रूप में सामने आने से पहले ही यदि लोगों के मन में डर, संदेह और अविश्वास उत्पन्न कर दिया जाए, तो वह मूल संकट से भी अधिक घातक सिद्ध होता है। यदि संकट आने से पहले ही सामाजिक असंतोष फैल गया, तो प्रशासनिक व्यवस्थाएं चरमरा जाएंगी और वास्तविक आवश्यकता के समय एक-दूसरे की सहायता करना असंभव हो जाएगा। यदि हम आपस में ही लड़ते रहे और विश्वास के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया, तो प्राकृतिक चुनौतियों से पहले मानव निर्मित असंतोष ही हमारे जीवन को दुभर बना देगा।
आपसी समझदारी और नागरिक कर्तव्य
ऐतिहासिक रूप से भारत की सबसे बड़ी ताकत ‘विविधता में एकता’ और ‘आपसी समझदारी’ ही रही है। संकट कितना भी विकट और भीषण क्यों न हो, यदि जनता और प्रशासन कंधे से कंधा मिलाकर काम करें, तो किसी भी आपदा पर विजय पाना असंभव नहीं है। वर्तमान समय में किसी भी भ्रामक समाचार या भयभीत करने वाले दुष्प्रचार पर आंख मूंदकर विश्वास न करना एक जागरूक नागरिक का सबसे पहला कर्तव्य है। सूखे जैसी विपदा के समय मानवीय संवेदनाओं को बनाए रखकर एक-दूसरे की मदद करना और समाज में शांति बनाए रखना ही सच्ची राष्ट्रसेवा है।
संयमित नेतृत्व और शांति का संरक्षण
सरकार और प्रशासन को भी अत्यंत संयम और पारदर्शिता के साथ कार्य करते हुए, समाज में विष घोलने वाले और जनता को डराने वाले ऐसे दुष्प्रचार का नकाब हटाना होगा। वैश्विक अशांति की तुलना में भारत की स्थिति आज कई गुना बेहतर और सुरक्षित है। इस स्थिरता और सौहार्द की रक्षा करना केवल सरकार का ही नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व है। दुष्प्रचार के बहकावे में न आकर, संयम, विवेक और आपसी समझदारी के बल पर ही हम आने वाली हर चुनौती का आत्मविश्वास के साथ सामना कर सकते हैं।
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