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विश्व का एकमात्र ब्रह्मदेव मंदिर पुष्कर में — आस्था, अध्यात्म और पौराणिक गौरव का संगम : हनुमानप्रसाद भारूका

🌸 आस्था और अध्यात्म का संगम — पुष्कर से विशेष रिपोर्ट 🌸

विश्व का एकमात्र ब्रह्मदेव मंदिर पुष्कर में — आस्था, अध्यात्म और पौराणिक गौरव का संगम : हनुमानप्रसाद भारूका

जालना : भारत की पावन भूमि राजस्थान के पुष्कर तीर्थ में स्थित भगवान ब्रह्मदेव का मंदिर संपूर्ण विश्व में ब्रह्मदेव को समर्पित एकमात्र मंदिर है। यह मंदिर अजमेर से लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर, प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर पर्वतीय क्षेत्र में बसा हुआ है। अध्यात्मिक लेखक एवं लायन्स क्लब जालना संस्कृति के अध्यक्ष हनुमानप्रसाद भारूका ने जानकारी दी कि यहाँ कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक चलने वाले पाँच दिवसीय भव्य उत्सव की शुरुआत हो चुकी है।

हनुमानप्रसाद भारूका ने बताया कि अजमेर से पुष्कर तक का रास्ता सर्पाकार आकार का है, जो वृक्षों और हरियाली से घिरा हुआ है। पुष्कर सरोवर के चारों ओर कुल 52 घाट स्थित हैं, जिनमें गऊ घाट और वराह घाट का विशेष धार्मिक महत्व है। उन्होंने बताया कि 1762 में सिख धर्म के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंहजी ने गऊ घाट पर गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ किया था। वहीं ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम ने अपनी पत्नी क्वीन मेरी की स्मृति में ‘जनाना घाट’ का निर्माण करवाया था।

भारूका के अनुसार, महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री जैसे महान नेताओं की अस्थियाँ भी इसी सरोवर में विसर्जित की गई थीं। उन्होंने बताया कि पुष्कर में ब्रह्मदेव मंदिर के साथ-साथ उनकी पत्नियाँ सावित्री देवी और गायत्री देवी के मंदिर भी स्थित हैं, साथ ही यहाँ लगभग 351 अन्य प्राचीन देवालय भी हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी पवित्र भूमि पर ब्रह्मदेव द्वारा संपन्न यज्ञ के कारण यह स्थान तीर्थराज पुष्कर कहलाया। यहाँ प्रतिवर्ष कार्तिक माह की एकादशी से पौर्णिमा तक विशाल मेला और यात्रा का आयोजन होता है, जिसमें भारत सहित विश्व के विभिन्न देशों से श्रद्धालु भाग लेते हैं। मंदिर परिसर में केसर और चंदन की सुगंध से वातावरण भक्तिमय हो उठता है, और श्रद्धालुओं के जयघोष से पूरा क्षेत्र गूंजने लगता है।

पौराणिक कथा — ‘पुष्कर’ नाम की उत्पत्ति

पौराणिक कथा के अनुसार, सत्ययुग के अंत में ब्रह्मदेव ने विश्वकल्याण हेतु “स्वस्तिः हो स्वस्तिः” का उच्चारण करते हुए अपने करकमलों से कमल पुष्प पृथ्वी पर छोड़े थे। वे पुष्प तीन स्थानों पर गिरे, जहाँ से जल स्रोत प्रकट हुए — जिन्हें बाद में ज्येष्ठ पुष्कर, मध्य पुष्कर और कनिष्ठ पुष्कर नाम दिया गया। ‘पुष्कर’ शब्द का अर्थ ही है — पुष्प (फूल) + कर (हाथ), अर्थात ब्रह्मदेव के हाथ से गिरे पुष्प।

सृष्टि निर्माण और ब्रह्मदेव की साधना

भारूका ने आगे बताया कि सृष्टि निर्माण में अवरोध आने पर ब्रह्मदेव ने महादेव की तपस्या की थी। भगवान शंकर ने अर्धनारीश्वर रूप में प्रकट होकर ब्रह्मदेव को आशीर्वाद दिया, और देवी पार्वती की कृपा से सृष्टि की प्रक्रिया पुनः आरंभ हुई। इसी घटना से ब्रह्मदेव की सहायक शक्ति का प्राकट्य हुआ, जिसने प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में जन्म लेकर सृष्टि के कार्य में संतुलन स्थापित किया।

“पुष्कर की यह यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और विश्व-बंधुत्व का जीवंत प्रतीक है। यहाँ आने वाला हर श्रद्धालु भक्ति, सुगंध और सकारात्मक ऊर्जा से ओतप्रोत वातावरण में आत्मिक शांति का अनुभव करता है।”

— हनुमानप्रसाद भारूका, अध्यक्ष, लायन्स क्लब जालना संस्कृति

NewsNationOnline Team


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Rashmi Bagdi
Rashmi Bagdi is a journalist and digital content creator associated with NewsNation Online. She specializes in reporting on local news, civic issues, education, government updates, and viral stories with a reader-focused approach.

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