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शादीशुदा पुरुष अविवाहित महिला के साथ रह सकता है? जानिए 2026 में भारतीय कानून

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कंप्यूटर द्वारा तैयार हिंदी ऑडियो

परिचय

भारत में विवाह कानूनी अधिकारों और जिम्मेदारियों वाला संबंध है। यदि विवाहित पुरुष अविवाहित महिला के साथ रहना चाहता है, तो उसे सहमति से साथ रहने, व्यभिचार, तलाक, द्विविवाह और भरण-पोषण के अलग-अलग कानूनी परिणाम समझने चाहिए। पहली शादी अपने आप समाप्त नहीं होती।

1. व्यभिचार अब अपराध नहीं

Joseph Shine बनाम भारत संघ (2018) में सर्वोच्च न्यायालय ने आईपीसी की धारा 497 को असंवैधानिक घोषित किया। भारतीय न्याय संहिता 2023 ने सामान्य व्यभिचार अपराध को पुनः लागू नहीं किया। फिर भी विवाहेतर संबंध के वैवाहिक परिणाम हो सकते हैं।

2. तलाक के आधार

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13(1)(i) के अनुसार विवाह के बाद दूसरे व्यक्ति से स्वैच्छिक यौन संबंध तलाक का आधार हो सकते हैं। धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता एक अलग आधार है। विवाहेतर संबंध की परिस्थितियाँ मानसिक क्रूरता के प्रश्न में प्रासंगिक हो सकती हैं। केवल संदेह से व्यभिचार सिद्ध नहीं होता और तलाक अपने आप या तुरंत नहीं मिलता; न्यायालय साक्ष्यों पर निर्णय करता है।

3. बिना तलाक दूसरी शादी

हिंदू विवाह अधिनियम की धाराओं 5(i) और 11 के तहत पहली वैध शादी जारी रहने पर दूसरी शादी सामान्यतः शून्य होती है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 82 के अंतर्गत कानूनी तत्व सिद्ध होने पर द्विविवाह में सात वर्ष तक की कैद और जुर्माना संभव है, लेकिन वैधानिक अपवाद भी हैं। केवल लिव-इन में रहना दूसरी विधिवत शादी का प्रमाण नहीं है। व्यक्तिगत कानूनों में अंतर हो सकता है।

4. लिव-इन संबंध और स्वतंत्रता

Lata Singh बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006) तथा S Khushboo बनाम Kanniammal (2010) में वयस्कों की स्वतंत्रता और पसंद से जुड़े सिद्धांत सामने आए। सहमति देने वाले वयस्कों का साथ रहना मात्र अपराध नहीं है। लेकिन इससे पहली शादी और उससे उत्पन्न जिम्मेदारियाँ समाप्त नहीं होतीं।

5. दूसरी महिला के अधिकार

Indra Sarma बनाम V K V Sarma (2013) में सर्वोच्च न्यायालय ने उस विशेष मामले में विवाहित पुरुष के साथ संबंध को घरेलू हिंसा कानून के तहत विवाह की प्रकृति वाला संबंध नहीं माना। हर मामले का परिणाम तथ्यों पर निर्भर है। हिंसा, धमकी और उत्पीड़न के विरुद्ध सामान्य कानूनी सुरक्षा बनी रहती है; विशेष आर्थिक या घरेलू हिंसा राहत की पात्रता अलग से तय होती है।

6. पत्नी और बच्चों के अधिकार

लागू कानून और परिस्थितियों के अनुसार पत्नी तलाक, बीएनएसएस धारा 144 के तहत भरण-पोषण, हिंदू विवाह अधिनियम धारा 24 के तहत अंतरिम सहायता और मुकदमे का खर्च, धारा 25 के तहत स्थायी गुजारा भत्ता, धारा 9 के तहत दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना और घरेलू हिंसा कानून के तहत राहत मांग सकती है। बच्चों के पालन-पोषण और अभिरक्षा में उनका हित महत्वपूर्ण है। भरण-पोषण की रकम अदालत आय, जरूरतों और अन्य परिस्थितियों को देखकर तय करती है; भारी रकम अपने आप नहीं लगती।

7. पति के तलाक मामले पर प्रभाव

हिंदू विवाह अधिनियम धारा 23 के तहत अदालत देखती है कि याचिकाकर्ता अपनी गलती का लाभ तो नहीं उठा रहा। किसी दूसरे संबंध से पति का मामला स्वतः खारिज नहीं होता, पर उसका आचरण प्रासंगिक हो सकता है। केवल वैवाहिक असंतोष या दूसरे से प्रेम तलाक का वैधानिक आधार नहीं है। क्रूरता या परित्याग जैसे आधार साबित करने होते हैं।

8. सही कानूनी रास्ता

जहाँ सुरक्षित और उचित हो, परामर्श या मध्यस्थता पर विचार करें। धारा 13B के अंतर्गत आपसी सहमति के तलाक के लिए वैधानिक शर्तें लागू हैं; छह महीने की प्रतीक्षा अवधि उपयुक्त मामलों में माफ हो सकती है, लेकिन छह महीने में तलाक की गारंटी नहीं है। सहमति न होने पर वैधानिक आधार पर विवादित तलाक की सलाह लें। भरण-पोषण, बच्चों और संपत्ति के मुद्दे सुलझाएँ। अंतिम तलाक डिक्री और पुनर्विवाह की लागू शर्तों से पहले दूसरी शादी न करें।

अधिवक्ता महेश सीताराम धन्नावत, बी.कॉम., एलएल.एम., जालना का संदेश

प्रकाशन के लिए प्रस्तावित वक्तव्य: विवाह में कानूनी जिम्मेदारियाँ होती हैं जिन्हें केवल असंतोष के कारण नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। व्यभिचार अब सामान्य अपराध नहीं है, लेकिन पहली पत्नी के अधिकार और बच्चों का हित महत्वपूर्ण हैं। दोनों पक्षों को नए संबंध से पहले अपने अधिकार समझने चाहिए और वैवाहिक विवाद का समाधान कानून के अनुसार करना चाहिए। लिव-इन संबंध से पुरानी जिम्मेदारियाँ अपने आप समाप्त नहीं होतीं।

निष्कर्ष और अस्वीकरण

व्यभिचार अपराध नहीं, सहमति से साथ रहना अपने आप अपराध नहीं, लेकिन द्विविवाह दंडनीय हो सकता है और वैवाहिक जिम्मेदारियाँ बनी रहती हैं। यह सामान्य कानूनी जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं। हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी तथा अन्य कानूनों में अंतर हो सकता है। दस्तावेज लेकर योग्य पारिवारिक अधिवक्ता से सलाह लें।


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dhannawatlaw Lawyer.

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