बीजिंग: चीन में माओ जेडोंग की मौत के 50 साल बाद उनकी किताबों और विचारों को लेकर युवाओं के एक हिस्से में फिर दिलचस्पी बढ़ती दिख रही है। खासकर Gen Z के कुछ युवा और प्रोफेशनल्स माओ की लिखी किताबों को पढ़ रहे हैं और उनके विचारों को आज की नौकरी, आर्थिक दबाव, असमानता और निजी जिंदगी की परेशानियों से जोड़कर देख रहे हैं।
माओ जेडोंग का निधन 9 सितंबर 1976 को हुआ था। 9 सितंबर 2026 को उनकी मौत के 50 साल पूरे हुए। इसी मौके पर चीन में माओ की विरासत एक बार फिर चर्चा में आई है। हालांकि इसे किसी बड़े राजनीतिक आंदोलन के रूप में नहीं देखा जा रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, यह ज्यादा एक ऐसी प्रवृत्ति है जिसमें कुछ युवा मौजूदा परेशानियों के बीच माओ के लेखन में संघर्ष, धैर्य और सामाजिक असमानता जैसे सवालों के जवाब तलाश रहे हैं।
आखिर युवा माओ की किताबें दोबारा क्यों पढ़ रहे हैं?
चीन के कई युवाओं के सामने नौकरी की बढ़ती प्रतिस्पर्धा, काम का दबाव, शिक्षा को लेकर चिंता और भविष्य को लेकर अनिश्चितता जैसे सवाल हैं। ऐसे माहौल में माओ की किताबों में संघर्ष, वर्ग, मेहनत और मुश्किल हालात से मुकाबले की बातें कुछ युवाओं को अपनी जिंदगी से जुड़ी हुई लग रही हैं।
South China Morning Post की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ ऑनलाइन इन्फ्लुएंसर माओ के विचारों को रोजमर्रा की जिंदगी के लिए सलाह की तरह पेश कर रहे हैं। ऑनलाइन बुक क्लब बन रहे हैं और AI से तैयार आवाज वाले वीडियो के जरिए माओ के भाषण और लेख नई पीढ़ी तक पहुंच रहे हैं। कुछ युवा उन्हें प्यार से “शिक्षक” कहकर भी संबोधित करते हैं।
Tsinghua University में माओ की किताबों की मांग
इस बढ़ती दिलचस्पी का एक संकेत बीजिंग की Tsinghua University से भी मिलता है। रिपोर्टों के मुताबिक, पिछले साल विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में Selected Works of Mao Zedong सबसे ज्यादा उधार ली जाने वाली किताबों में रही। चीन के ऑनलाइन बाजार में माओ की तस्वीर वाले सामान की बिक्री में भी दिलचस्पी देखी गई।
क्या यह सिर्फ राजनीति है? जवाब इतना आसान नहीं
विश्लेषकों के मुताबिक, युवाओं का यह रुझान सिर्फ माओ की राजनीतिक विचारधारा को अपनाने का मामला नहीं है। कई युवा माओ को उस दौर के नेता के तौर पर नहीं, बल्कि मुश्किल परिस्थितियों से लड़ने और हार के बाद दोबारा कोशिश करने की प्रेरणा के रूप में पढ़ रहे हैं। आज पैदा हुई Gen Z ने माओ का दौर देखा नहीं है, इसलिए उसके लिए माओ एक ऐतिहासिक शख्सियत हैं, जिनके विचारों को वह अपनी मौजूदा जिंदगी के हिसाब से नए तरीके से समझ रही है।
आर्थिक दबाव और असमानता भी बड़ी वजह
चीन की अर्थव्यवस्था में कई क्षेत्रों में दबाव, रोजगार की चिंता और संपत्ति तथा आय की असमानता को लेकर युवाओं में बेचैनी है। हालिया रिपोर्टिंग में चीन के कुछ शहरों में उत्पादन और आम लोगों की खपत के बीच बड़ा अंतर भी सामने आया है। यानी तकनीकी और औद्योगिक क्षेत्र में तेजी के बावजूद हर वर्ग तक आर्थिक सुधार का फायदा एक जैसा नहीं पहुंच रहा।
इसी माहौल में माओ के वर्ग संघर्ष और असमानता से जुड़े विचार कुछ युवाओं को मौजूदा व्यवस्था को समझने का एक नजरिया दे रहे हैं। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि चीन की पूरी Gen Z माओ की तरफ लौट रही है। उपलब्ध रिपोर्टें इसे युवाओं के एक हिस्से में बढ़ती दिलचस्पी के रूप में दिखाती हैं।
अमेरिका से तनाव के दौरान भी माओ के विचार वायरल
माओ के विचारों का इस्तेमाल चीन-अमेरिका तनाव के समय भी सोशल मीडिया पर दिखाई देता है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी टैरिफ और दोनों देशों के बीच बढ़े तनाव के दौरान कुछ चीनी सोशल मीडिया यूजर्स ने माओ के पुराने भाषणों और उनके चर्चित “पेपर टाइगर” वाले विचार का हवाला दिया। इससे पता चलता है कि माओ की विरासत को कुछ लोग राष्ट्रवाद और बाहरी दबाव के खिलाफ चीन की ताकत के प्रतीक के तौर पर भी देखते हैं।
लेकिन माओ की विरासत का दूसरा पक्ष भी बेहद विवादित
माओ की लोकप्रियता या उनकी किताबों की बढ़ती मांग का मतलब यह नहीं है कि उनके शासन के विवादित अध्याय खत्म हो गए हैं। 1966 से 1976 के बीच चली Cultural Revolution ने चीन में भारी राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल पैदा की। राजनीतिक उत्पीड़न, हिंसा और आर्थिक नुकसान ने समाज पर गहरा असर डाला। बाद में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने Cultural Revolution को गंभीर गलती माना और इसके लिए माओ को मुख्य जिम्मेदारी दी।
Great Leap Forward की नीतियां भी चीन के इतिहास के सबसे दुखद अध्यायों में गिनी जाती हैं। माओ की विरासत इसलिए आज भी दोहरी है—एक तरफ उन्हें आधुनिक चीन की स्थापना और राष्ट्रीय एकता के महत्वपूर्ण नेता के रूप में देखा जाता है, तो दूसरी तरफ उनके शासन की नीतियों से हुई भारी मानवीय त्रासदी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
50वीं पुण्यतिथि पर चीन में क्या हुआ?
9 सितंबर 2026 को माओ की मौत की 50वीं बरसी थी। इस मौके पर चीन में कोई बड़ा केंद्रीय स्मृति समारोह घोषित नहीं किया गया। हालांकि बीजिंग स्थित Chairman Mao Memorial Hall ने उस दिन अपने सामान्य समय से तीन घंटे ज्यादा खुलने की व्यवस्था की। रिपोर्ट के मुताबिक, उस सप्ताह के विजिटिंग स्लॉट पूरी तरह बुक थे।
शी जिनपिंग के दौर में माओ की विरासत
माओ की विरासत आज भी चीन की आधिकारिक राजनीतिक पहचान का हिस्सा है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने माओ की ऐतिहासिक भूमिका को खारिज नहीं किया है। Reuters के मुताबिक, शी के दौर में पार्टी अनुशासन, वैचारिक एकरूपता, मजबूत नेतृत्व और राष्ट्रवाद पर जोर बढ़ा है, जिससे माओ-युग की कुछ राजनीतिक भाषा और प्रतीकों की याद आती है।
हालांकि आज का चीन माओ के समय के चीन से काफी अलग है। देंग शियाओपिंग के दौर में आर्थिक सुधारों ने चीन को बाजार आधारित व्यवस्था की तरफ बढ़ाया और आने वाले दशकों में देश दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक और व्यापारिक ताकतों में शामिल हुआ। आज माओ को पढ़ने वाले युवा उसी आधुनिक चीन में रहते हैं, लेकिन उनके सामने नई तरह की आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां हैं।
माओ की वापसी को कैसे समझें?
फिलहाल माओ की किताबों के प्रति बढ़ती दिलचस्पी को किसी नए राजनीतिक आंदोलन की शुरुआत कहना जल्दबाजी होगी। ज्यादा सही तस्वीर यह है कि चीन के कुछ युवा आर्थिक अनिश्चितता, नौकरी के तनाव, असमानता और भविष्य की चिंता के बीच इतिहास के एक बेहद प्रभावशाली नेता के विचारों को नए नजरिए से पढ़ रहे हैं।
यानी 50 साल बाद माओ की वापसी शायद पूरी तरह राजनीतिक वापसी नहीं, बल्कि एक ऐसी पीढ़ी की तलाश भी है जो अपने मुश्किल दौर को समझने और उससे निपटने के लिए पुराने विचारों में नए मतलब तलाश रही है। यही वजह है कि माओ की किताबें, भाषण और विचार आज फिर चीन की Gen Z के एक हिस्से के बीच चर्चा में हैं।
स्रोत: Reuters, South China Morning Post, Economic Times, EL PAÍS और India Today की रिपोर्टों के आधार पर।

