जालना – दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है। हर वर्ष हम मैदान में रावण का पुतला जलाते हैं, लेकिन असली रावण हमारे मन में ही बैठा है। इन शब्दों में अधिवक्ता महेश धन्नावत ने इस वर्ष जालना के नागरिकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया है।
दशहरा उत्सव के अवसर पर अधिवक्ता धन्नावत ने कहा कि त्योहारों का सच्चा अर्थ दिखावे में नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन में है।
अधिवक्ता महेश धन्नावत ने कहा –
रावण के दस सिर थे, इसलिए हम उसे दशानन कहते हैं। लेकिन आज हर व्यक्ति के मन में भी रावण के दस सिर जीवित हैं। जब तक वे जीवित हैं, तब तक बाहर कितने भी पुतले जला दिए जाएं, सच्चे अर्थों में विजयादशमी नहीं मनाई जा सकती।
इस वर्ष हम संकल्प लें कि अपने भीतर के रावण को ही समाप्त करेंगे। मेरे सभी जालना वासियों से विनम्र अनुरोध है कि इस वर्ष अपने भीतर की इन दस बुराइयों का दहन करें –
- अहंकार जलाएं
- क्रोध जलाएं
- ईर्ष्या – दूसरों से जलने की भावना जलाएं
- लोभ – असीम लालच जलाएं
- मोह – गलत आकर्षण जलाएं
- मद – सत्ता और धन का घमंड जलाएं
- द्वेष – मन की कटुता जलाएं
- स्वार्थ – केवल मैं ही सही हूं, यह सोच जलाएं
- असत्य – झूठ जलाएं
- हिंसा – दूसरों को दुख पहुंचाने की प्रवृत्ति जलाएं
जब ये दस सिर जल जाएंगे, तब मनुष्य सच्चे अर्थों में मनुष्य बनेगा। यही वास्तविक दशहरा है। मैदान का रावण जलकर राख हो जाता है, लेकिन मन का रावण जल जाए तो जीवन सोना बन जाता है।
अधिवक्ता धन्नावत के इन हृदयस्पर्शी विचारों को जालना के नागरिकों से व्यापक प्रतिसाद मिल रहा है और ‘भीतर के रावण को मारो’ का संदेश चर्चा का विषय बना हुआ है।
Discover more from NewsNation Online
Subscribe to get the latest posts sent to your email.









Leave a Reply