प्रयागराज/जालना: बुजुर्ग विधवा मां से अलग रहने के लिए पति पर लगातार दबाव डालना परिस्थितियों और साक्ष्यों के आधार पर मानसिक क्रूरता हो सकता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक वैवाहिक विवाद में पति की अपील स्वीकार कर तलाक की डिक्री दी है।
क्या था विवाद?
पति के अनुसार उसकी पत्नी उसे अपनी 68 वर्षीय विधवा मां से अलग रहने के लिए दबाव डालती थी। उसने मां के अपमान और झूठे आपराधिक मामलों में फंसाने की धमकी के आरोप भी लगाए। पत्नी लंबे समय से अलग रह रही थी। अदालत ने गवाहों के बयान और अन्य अप्रतिवादित साक्ष्यों का परीक्षण किया। पत्नी की मां और भाई की गवाही भी लंबे अलगाव से संबंधित दावों के समर्थन में थी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने पारिवारिक अदालत का फैसला पलटते हुए तलाक मंजूर किया। साथ ही स्पष्ट किया कि पत्नी हिंदू विवाह अधिनियम के तहत स्थायी गुजारा भत्ते के लिए उचित आवेदन कर सकती है।
एडवोकेट महेश धन्नावत का दृष्टिकोण
जालना के अधिवक्ता महेश सीताराम धन्नावत (बी.कॉम., एलएल.एम.) के लिए प्रस्तावित टिप्पणी: “विवाह के बाद वृद्ध माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। पति-पत्नी दोनों के सम्मान और अधिकारों की रक्षा आवश्यक है। बुजुर्गों की देखभाल और वैवाहिक जीवन के बीच संतुलन होना चाहिए। हर मामले का निर्णय उसके तथ्यों और सबूतों पर निर्भर करता है।”
कानूनी संदर्भ: हर अलग रहने की मांग स्वतः मानसिक क्रूरता नहीं है। इस निर्णय का आधार संबंधित मामले के विशिष्ट तथ्य और साक्ष्य हैं।
स्रोत: Law Trend
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