जालना (प्रतिनिधि). डॉक्टरों को महंगे उपहार, विदेश यात्राएं और अन्य आर्थिक सुविधाएं देकर दवाओं की बिक्री बढ़ाने के आरोपों से जुड़ी गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई है. उपलब्ध प्रेस सामग्री के अनुसार, अदालत के समक्ष केंद्र सरकार ने तीन सदस्यीय समिति गठित करने का निर्णय लेने की जानकारी दी. प्रस्तावित समिति दो महीने में अपनी रिपोर्ट सौंप सकती है.
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की याचिका में दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों के लिए प्रभावी कानूनी जवाबदेही तय करने का मुद्दा उठाया गया. प्रेस सामग्री में अगली सुनवाई 29 जनवरी बताई गई है, हालांकि उसका वर्ष स्पष्ट नहीं है.
तोहफे लेने वाले डॉक्टरों पर कार्रवाई, देने वाली कंपनियों की जवाबदेही पर सवाल
याचिका में कहा गया है कि डॉक्टरों के अनुचित लाभ स्वीकार करने पर पेशेवर अनुशासनात्मक कार्रवाई की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन ऐसे प्रलोभन देने वाली दवा कंपनियों पर सीधे दंडात्मक कार्रवाई के लिए पर्याप्त वैधानिक ढांचे की जरूरत है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि प्रलोभन देने वालों की जिम्मेदारी तय किए बिना इस समस्या पर प्रभावी रोक मुश्किल होगी.
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, केंद्र ने संबंधित मंत्रालयों से विचार-विमर्श के बाद तीन सदस्यीय समिति बनाने का निर्णय लिया है. समिति मौजूदा नियमों की समीक्षा कर सुझाव देगी.
महंगे तोहफों का बोझ मरीजों पर पड़ सकता है : एड. महेश धन्नावत
जालना के वरिष्ठ अधिवक्ता एड. महेश धन्नावत ने इस पहल का स्वागत किया. उन्होंने कहा कि दवा कंपनियों की ओर से डॉक्टरों को महंगे उपहार, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, विदेश यात्राएं और अन्य सुविधाएं देने से इलाज की निष्पक्षता और मरीजों के हितों को लेकर सवाल उठते हैं. ऐसे प्रचार खर्च का असर दवाओं की कीमतों पर पड़ने की आशंका भी रहती है.
एड. धन्नावत ने कहा, “डॉक्टर और मरीज के बीच का रिश्ता भरोसे पर टिका होता है. मरीज यह विश्वास करके डॉक्टर के पास जाता है कि उसे उसकी बीमारी के अनुसार सबसे उचित इलाज और दवा मिलेगी. इस भरोसे को किसी कंपनी के आर्थिक प्रलोभन से प्रभावित नहीं होने देना चाहिए.”
केवल डॉक्टर नहीं, दवा कंपनियां भी हों जवाबदेह
एड. धन्नावत के अनुसार, चिकित्सा क्षेत्र में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए उपहार स्वीकार करने वालों के साथ अनुचित लाभ देने वाली कंपनियों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए. उन्होंने स्पष्ट और प्रभावी कानूनी प्रावधान बनाने पर जोर दिया. उनके मुताबिक जीवन और स्वास्थ्य से जुड़े अधिकारों का संबंध संविधान के अनुच्छेद 21 से भी है.
अनावश्यक महंगी दवाओं को लेकर चिंता
मामले में चिंता जताई गई है कि अनुचित आर्थिक प्रलोभन डॉक्टरों के दवा लिखने के फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं. इससे मरीजों को अनावश्यक या महंगी दवाएं खरीदनी पड़ सकती हैं. हालांकि, हर चिकित्सक या दवा कंपनी को ऐसे व्यवहार से जोड़ना उचित नहीं है; मुद्दा कथित अनुचित मार्केटिंग गतिविधियों पर नियंत्रण का है.
समिति की रिपोर्ट के बाद आगे की प्रक्रिया
प्रस्तावित समिति की सिफारिशों के बाद केंद्र सरकार आगे के उपायों पर विचार कर सकती है. अभी नया दंडात्मक कानून लागू हो जाने का दावा करना सही नहीं होगा. मामले में अदालत के आदेश और समिति के गठन की अद्यतन स्थिति की पुष्टि महत्वपूर्ण है.
आधिकारिक संदर्भ: भारत का सर्वोच्च न्यायालय | औषध विभाग, भारत सरकार.
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संपादकीय सूचना: अगली सुनवाई की तारीख और समिति के गठन की स्थिति मूल प्रेस सामग्री पर आधारित है. चित्र सांकेतिक AI-निर्मित समाचार ग्राफिक है.
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