“हमारी रीढ़ की हड्डी सीधी है। अमेरिका चाहे सातवां बेड़ा भेजे या सत्तरवां, भारत अपने निर्णय से पीछे नहीं हटेगा।” — इंदिरा गांधी का ऐतिहासिक उत्तर फिर चर्चा में
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नई दिल्ली | विशेष संवाददाता रिपोर्ट | 11 मई 2025
10 मई 2025 को भारत और पाकिस्तान के बीच अमेरिकी मध्यस्थता से हुए संघर्षविराम की घोषणा के बाद, सोशल मीडिया पर एक नाम सबसे ज़्यादा चर्चा में आ गया — इंदिरा गांधी। लोगों ने 1971 के युद्धकाल में उनके साहसिक नेतृत्व और अमेरिकी दबाव को ठुकराने वाले ऐतिहासिक बयान को मौजूदा घटनाक्रम से जोड़ते हुए फिर याद किया।
क्या हुआ है अब?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर घोषणा की कि भारत और पाकिस्तान ने अमेरिका की मध्यस्थता में पूर्ण संघर्षविराम पर सहमति जताई है। यह बयान ऐसे समय आया जब कश्मीर सीमा पर लगातार तनाव और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसी सर्जिकल कार्रवाइयों की खबरें चर्चा में थीं।
इंदिरा गांधी का ऐतिहासिक उत्तर
— इंदिरा गांधी, 1971 भारत-पाक युद्ध के दौरान
1971 के युद्ध के दौरान जब अमेरिका ने भारत पर दबाव डालने के लिए ‘Seventh Fleet’ बंगाल की खाड़ी में भेजा, तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को यह करारा जवाब दिया था। उन्होंने न केवल सैन्य कार्रवाई जारी रखी, बल्कि बांग्लादेश की आज़ादी सुनिश्चित की।
कांग्रेस का हमला और राजनीतिक बहस
वर्तमान संघर्षविराम की तुलना 1971 की निर्णायक नीति से करते हुए कांग्रेस नेताओं ने कहा कि आज के भारत को फिर से वैसी ही दृढ़ता चाहिए। “अगर इंदिरा गांधी होतीं तो अमेरिका की मध्यस्थता की आवश्यकता ही नहीं होती” — ऐसा कई नेताओं ने ट्वीट किया।
जनता का नजरिया
- “आज भी भारत को वैसी ‘रीढ़ की हड्डी’ चाहिए जो न झुके, न डरे।”
- “इंदिरा गांधी ने अमेरिका को उसी की भाषा में जवाब दिया था, वो आज संभव नहीं दिखता।”
- “आज फिर देश को लौह नेतृत्व की तलाश है।”
निष्कर्ष:
इंदिरा गांधी का ट्रेंडिंग होना केवल इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि यह जनता की आकांक्षा का प्रतीक है — एक ऐसा नेतृत्व जो आत्मविश्वास, राष्ट्रीय सम्मान और विदेशी दबाव से ऊपर उठकर निर्णय ले सके।

