नाना पाटेकर को किसी एक तरह के किरदार में बाँधना मुश्किल है। उनकी फिल्मों में अपराध की दुनिया भी है, सामाजिक सवाल भी और ऐसी कॉमेडी भी, जिसमें उनके गुस्से का अंदाज ही हँसी की वजह बन जाता है। उनके काम को समझने का अच्छा तरीका पाँच अलग फिल्मों को साथ रखकर देखना है।
यह चयन अभिनय की विविधता समझने के लिए है। इसे कमाई या लोकप्रियता के आधार पर बनाई गई रैंकिंग नहीं माना जाना चाहिए। हर फिल्म नाना के काम का एक अलग पहलू सामने लाती है।
1. परिंदा: सहायक भूमिका में भी असरदार मौजूदगी
‘परिंदा’ (1989) उनके करियर की अहम फिल्मों में शामिल है। इसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। Indian Express की पुरस्कार सूची भी इस उपलब्धि को दर्ज करती है। यह फिल्म देखने का एक कारण है कि कहानी में नायक के अलावा दूसरे किरदार किस तरह अपना असर छोड़ते हैं।
2. क्रांतिवीर: सामाजिक सवालों वाला अभिनय
‘क्रांतिवीर’ (1994) के लिए नाना पाटेकर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इस भूमिका को उनके करियर की पहचान बनाने वाले काम में गिना जाता है। इसे देखते समय केवल ऊँची आवाज वाले संवादों पर ध्यान देने के बजाय यह देखना दिलचस्प है कि वे दृश्य की भावनात्मक ऊर्जा कैसे बनाए रखते हैं।
3. अग्नि साक्षी: अलग तरह की चुनौती
‘अग्नि साक्षी’ (1996) ने उन्हें एक और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिलाया—इस बार सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता की श्रेणी में। पुरस्कारों का यह क्रम दिखाता है कि उनकी पहचान केवल मुख्य भूमिका तक सीमित नहीं थी। कहानी में किरदार की स्थिति बदल सकती थी, लेकिन उसके लिए तैयार किया गया अभिनय अपना महत्व रखता था।
4. अब तक छप्पन: पुलिस अधिकारी का किरदार
‘अब तक छप्पन’ (2004) में उन्होंने इंस्पेक्टर साधु आगाशे की भूमिका निभाई। Apple TV की फिल्म सूची में भी उनका यह किरदार दर्ज है। अपराध आधारित कहानी में अभिनय को समझने के लिए चेहरे के भाव, विराम और बातचीत के तरीके पर ध्यान दिया जा सकता है।
5. वेलकम: उदय शेट्टी का हास्य
‘वेलकम’ (2007) में उदय शेट्टी की भूमिका उनके हास्य अभिनय का परिचित उदाहरण है। IMDb के किरदार विवरण में यह भूमिका दर्ज है। यहाँ वही तीखी प्रतिक्रिया, जो किसी गंभीर दृश्य में तनाव पैदा कर सकती है, हास्य के माहौल में अलग असर देती है।
इन फिल्मों को साथ देखकर क्या समझ आता है?
एक अभिनेता की क्षमता का आकलन केवल यादगार संवादों से नहीं होता। अलग-अलग कहानियों में वह कितने अलग भाव और व्यवहार दिखा पाता है, यह भी मायने रखता है। इन पाँच फिल्मों का चयन इसी नजरिए से किया गया है। फिल्म देखते समय उसका पूरा संदर्भ देखना, छोटी सोशल मीडिया क्लिप से अधिक उपयोगी हो सकता है।

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