एर्नाकुलम | प्रतिनिधि: इलाज के दौरान मरीज को दी गई दवा का अलग से पक्का बिल नहीं देना एक अस्पताल को भारी पड़ गया। एर्नाकुलम जिला ग्राहक शिकायत निवारण आयोग ने मामले की सुनवाई करते हुए अस्पताल को मरीज को कुल 53,900 रुपये देने का आदेश दिया है।
यह मामला ओ. विनोद कुमार बनाम समेरिटन हार्ट इंस्टीट्यूट से जुड़ा है। विनोद कुमार ने ग्राहक संरक्षण कानून के तहत शिकायत क्रमांक 38/2019 दाखिल की थी।
43,900 रुपये का इंजेक्शन दिया गया था
काम के दौरान अचानक सीने में तेज दर्द होने के बाद विनोद कुमार को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज के दौरान उन्हें करीब 43,900 रुपये कीमत का ‘इलाक्सिम 40 मिलीग्राम’ इंजेक्शन दिया गया।
विनोद कुमार कर्मचारी राज्य बीमा योजना (ESI) के लाभार्थी थे। इलाज का खर्च बीमा योजना के तहत वापस पाने के लिए उन्होंने अस्पताल से इस इंजेक्शन का अलग और अधिकृत बिल मांगा। आरोप है कि अस्पताल ने बिल देने से इनकार कर दिया।
अस्पताल की ओर से कहा गया कि दवाओं की थोक में खरीद की जाती है, इसलिए मरीज को हर दवा का अलग बिल देना संभव नहीं है।
बिल नहीं मिलने से अटका मेडिकल क्लेम
शिकायतकर्ता के मुताबिक, अस्पताल से बिल नहीं मिलने के कारण संबंधित बीमा विभाग ने उनका मेडिकल क्लेम मंजूर नहीं किया। इससे उन्हें 43,900 रुपये का सीधा आर्थिक नुकसान हुआ।
मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने अस्पताल के थोक खरीद वाले तर्क को स्वीकार नहीं किया।
मानसिक परेशानी और शिकायत खर्च के भी 5-5 हजार रुपये
आयोग के अध्यक्ष डी. बी. बिनू, सदस्य वी. रामचंद्रन और सदस्य श्रीविद्या टी. एन. की पीठ ने अस्पताल को शिकायतकर्ता के 43,900 रुपये के नुकसान की भरपाई करने का निर्देश दिया।
इसके अलावा मरीज को हुई मानसिक परेशानी के लिए 5,000 रुपये और शिकायत का खर्च उठाने के लिए 5,000 रुपये देने का आदेश दिया गया। इस तरह अस्पताल को कुल 53,900 रुपये का भुगतान करना होगा।
आयोग ने यह राशि आदेश की प्रति मिलने के 45 दिनों के भीतर देने को कहा है। तय समय में भुगतान नहीं करने पर राशि पर 9 प्रतिशत सालाना ब्याज लागू होगा।
‘मरीज को दवाओं का स्पष्ट बिल मिलना चाहिए’
फैसले का स्वागत करते हुए विधीज्ञ एडवोकेट महेश धन्नावत ने कहा कि अस्पताल में भर्ती मरीज को इलाज के दौरान दी गई दवाओं, इंजेक्शन और मेडिकल सामग्री की जानकारी और उसका बिल स्पष्ट रूप से मिलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि कई बार निजी और धर्मार्थ अस्पताल थोक खरीद या अपने आंतरिक नियमों का हवाला देकर दवाओं के अलग बिल नहीं देते। इसका सीधा असर मरीजों के मेडिकल इंश्योरेंस क्लेम पर पड़ सकता है।
धन्नावत ने महाराष्ट्र सरकार से मांग की कि राज्य के निजी और सरकारी अस्पतालों में मरीजों को दवाओं और मेडिकल सामग्री के पारदर्शी और अलग बिल उपलब्ध कराने के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएं। इससे मरीजों को बीमा क्लेम लेने में परेशानी नहीं होगी और अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था में भी पारदर्शिता बढ़ेगी।