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“मौन का तूफ़ान”

“Storm of Silence”

इस खामोशी में गूंजते हैं शोर,
बंद दरवाज़ों के पीछे उठते हैं हिलोर।
वो आंखें जो कभी चमकती थीं,
अब कहीं दूर ख्वाबों में भटकती हैं।

क्या मेरी बातें रंग खो बैठीं?
या तेरे दिल तक पहुँच ना सकीं?
जो हंसी थी अपनी, जो ख्वाब थे बुनते,
अब वो भी जैसे अधूरे से लगते।

पर तूफ़ानों से डरता नहीं ये दिल,
तेरी चुप्पी को तोड़ दूँगा मैं पल में।
तेरे साए में अब भी उजाला है,
अंधेरों में भी तेरा दीवाना है।

तो बोल, या मैं कहने दूँ अपने जज़्बात,
इस तूफ़ान में भी है मेरा जज़्बा हज़ार।
कोई दूरी नहीं, कोई मौन नहीं अटूट,
हमारा प्यार है अमर, ये रिश्ता है अडिग।


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Imran Siddiqui

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