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गाज़ा युद्ध के खिलाफ आवाज़ उठाना पड़ा भारी — MIT ने भारतीय छात्रा मेघा वेमुरी को दीक्षांत समारोह से किया बाहर!

MIT की भारतीय छात्रा ने मंच से गाज़ा पर उठाई आवाज़, विश्वविद्यालय ने दीक्षांत समारोह में किया बैन!

स्थान: अमेरिका | तारीख: 2 जून 2025
✍️ रिपोर्ट: न्यूज़ नेशन ऑनलाइन डेस्क


मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) की छात्रा और 2025 की क्लास प्रेसिडेंट मेघा वेमुरी को गाज़ा युद्ध के खिलाफ भाषण देने के चलते दीक्षांत समारोह से बाहर कर दिया गया है। यह घटना अमेरिका के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गहरे सवाल खड़े कर रही है।

29 मई को आयोजित ‘OneMIT Commencement’ कार्यक्रम में मेघा वेमुरी ने मंच से गाज़ा में हो रही हिंसा की कड़ी आलोचना की। उन्होंने अपने भाषण के दौरान केफियाह (फिलिस्तीन समर्थन का प्रतीक वस्त्र) पहन रखा था और MIT के इज़राइल से संबंधों पर भी सवाल उठाए।

इसके बाद उन्हें सूचित किया गया कि वे 30 मई को दीक्षांत समारोह में शामिल नहीं हो सकतीं और तब तक कैंपस में प्रवेश वर्जित रहेगा।

MIT का बयान

MIT के प्रवक्ता ने कहा:

“छात्रा ने आयोजकों को गुमराह किया और मंच से अनधिकृत रूप से प्रदर्शन किया। विश्वविद्यालय स्वतंत्र अभिव्यक्ति का समर्थन करता है, लेकिन यह कार्रवाई उचित थी।”

विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया कि मेघा को उनकी डिग्री डाक द्वारा भेजी जाएगी।

मेघा वेमुरी की प्रतिक्रिया

CNN से बातचीत में मेघा ने कहा:

“मैं उस स्टेज पर नहीं चलना चाहती, जो ऐसे संस्थान की है जो नरसंहार में भागीदार है। यह निर्णय बिना किसी वैध नीति उल्लंघन के लिया गया, जो अनुचित है।”

उन्होंने कहा कि उनके माता-पिता का समर्थन उन्हें ताक़त देता है और वे अपने निर्णय पर अडिग हैं।

CAIR का विरोध

काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस (CAIR) ने MIT की कार्रवाई की आलोचना की।

“MIT को छात्रों की अभिव्यक्ति का सम्मान करना चाहिए। फिलिस्तीन की मानवता के पक्ष में आवाज़ उठाना सज़ा देने का कारण नहीं होना चाहिए।” — ताहिरा अमतुल-वदूद, CAIR-Massachusetts

पृष्ठभूमि और बढ़ते विरोध

अक्टूबर 2023 के बाद गाज़ा युद्ध के विरोध में अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में प्रदर्शन हुए। हार्वर्ड, कोलंबिया और न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के छात्रों को भी ऐसी ही अनुशासनात्मक कार्रवाइयों का सामना करना पड़ा।

MIT ने 2024 से प्रदर्शन को लेकर सख्त नीतियां लागू की हैं और बिना पूर्व अनुमति वाले विरोधों पर कठोर कार्रवाई की जा रही है।


निष्कर्ष: यह मामला केवल एक छात्रा की सज़ा नहीं, बल्कि यह शिक्षा संस्थानों में नैतिक आवाज़ों की स्वतंत्रता और प्रशासनिक सख्ती के बीच टकराव का प्रतीक बन गया है।

© http://www.newsnationonline.com | इंटरनेशनल ब्यूरो

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Imran Siddiqui

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