जालना: पुराने जालना के लक्ष्मीनारायणपुरा इलाके में गणेशोत्सव केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक एकजुटता, सेवा और सांस्कृतिक परंपरा का भी उदाहरण बन चुका है। पद्मशाली समाज की ओर से यहां हर साल अलग-अलग ऐतिहासिक मंदिरों और धार्मिक स्थलों की आकर्षक प्रतिकृतियों पर आधारित भव्य देखावे तैयार किए जाते हैं। खास बात यह है कि इन देखावों को सभी श्रद्धालुओं के लिए नि:शुल्क रखा जाता है।

पुराने जालना में संस्कृति और आस्था का संगम
लक्ष्मीनारायणपुरा ऐतिहासिक लक्ष्मीनारायण मंदिर के कारण भी अपनी अलग पहचान रखता है। इस इलाके में बड़ी संख्या में पद्मशाली समाज के परिवार रहते हैं। मूल रूप से आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से जुड़े इस समाज ने लंबे समय से महाराष्ट्र और मराठवाड़ा की सामाजिक-सांस्कृतिक धारा के साथ मजबूत रिश्ता बनाया है। गणेशोत्सव के माध्यम से यहां स्थानीय संस्कृति के साथ अपनी परंपराओं का सुंदर मेल देखने को मिलता है।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने सार्वजनिक गणेशोत्सव को सामाजिक एकजुटता और जनजागरण का माध्यम बनाया था। लक्ष्मीनारायणपुरा का उत्सव भी सामूहिक भागीदारी और सेवा की इसी भावना की याद दिलाता है।
हर साल कुछ नया करने की कोशिश
लक्ष्मीनारायणपुरा के गणेश मंडलों की खास बात यह है कि यहां के युवा हर साल कुछ नया और अलग करने की कोशिश करते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिरों तथा धार्मिक स्थलों की प्रतिकृतियां और आकर्षक देखावे तैयार किए जाते हैं।
8 से 10 शानदार देखावे, वह भी पूरी तरह नि:शुल्क
इस वर्ष भी इलाके में कम से कम 8 से 10 आकर्षक देखावे तैयार किए गए। प्रत्येक देखावे और संबंधित देवस्थान की जानकारी देने के लिए बैनर और सूचना फलक लगाए गए थे। सभी देखावे श्रद्धालुओं के लिए नि:शुल्क रखे गए।
गणेशोत्सव के दौरान महाप्रसाद और अन्नदान की व्यवस्था भी चलती रही। महिलाओं और मंडल के पदाधिकारियों ने सेवा कार्य में सक्रिय भागीदारी निभाई।
छोटी गलियां, लेकिन सेवा की भावना बड़ी
लक्ष्मीनारायणपुरा की गलियां संकरी हैं और यहां कई घर छोटे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों की सामूहिक भावना और एक-दूसरे के सहयोग की मिसाल बड़ी है। सीमित जगह और संसाधनों के बावजूद बड़े स्तर पर उत्सव आयोजित करना यहां के लोगों की मेहनत और संगठन क्षमता को दिखाता है।
सीमित आमदनी के बावजूद उत्सव के लिए बचत
इलाके के कई परिवार सामान्य या सीमित आय वाले हैं। परिवार की महिलाएं बीड़ी बनाने जैसे मेहनत वाले काम करती हैं, जबकि पुरुष और युवा छोटे-बड़े रोजगार तथा व्यवसाय के जरिए परिवार चलाते हैं। इसके बावजूद गणेशोत्सव के लिए उनकी आस्था और समर्पण कम नहीं होता।
गणेशोत्सव समाप्त होते ही अगले वर्ष की तैयारी शुरू हो जाती है। परिवार अपनी क्षमता के अनुसार हर महीने थोड़ी-थोड़ी बचत करते हैं और उसी से अगले उत्सव के लिए धन जुटाया जाता है।
लेखक ने साझा किया अपना अनुभव
लेखक श्याम सारस्वत के अनुसार, उन्होंने इस गणेशोत्सव का अनुभव दो बार किया। पहली बार गणेश महासंघ के कार्याध्यक्ष ॲड. महेश धन्नावत के साथ और दूसरी बार समाचार पत्र के संपादक संजयजी भरतिया के साथ उन्होंने लक्ष्मीनारायणपुरा का दौरा किया। इस दौरान मित्र आशिष ओझा के माध्यम से मंडल के पदाधिकारियों से परिचय हुआ।
लेखक के मुताबिक, इस आयोजन के पीछे की मेहनत और सामाजिक पृष्ठभूमि को जानने के बाद यह महसूस होता है कि बड़े काम के लिए केवल आर्थिक संसाधन ही जरूरी नहीं होते। सामूहिक प्रयास, निष्ठा, सेवा और मजबूत इच्छाशक्ति भी किसी आयोजन को यादगार बना सकती है।
पद्मशाली समाज की मिसाल
लक्ष्मीनारायणपुरा का यह गणेशोत्सव बताता है कि सीमित साधनों के बावजूद समाज अपनी संस्कृति और परंपरा को किस तरह जीवंत रख सकता है। यहां के युवाओं की रचनात्मकता, महिलाओं की सेवा भावना और परिवारों की सामूहिक भागीदारी इस आयोजन की बड़ी ताकत है।
लेखक: श्याम सारस्वत
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